आंकड़े और हम

आंकड़ों की समझ जरूरी होती जा रही है. सही निर्णय लेने में, अपने पूर्वाग्रहों को समझने में. आंकड़ों का इस्तेमाल बेवकूफ़ बनाने में भी खूब होता हैं. अंग्रेजी की एक कहावत का तर्जुमा करूँ तो “झूठ के बढ़ते हुए स्तर हैं  – झूठ, सफ़ेद झूठ और आंकड़े”. मैं ‘द हिन्दू’ अखबार पढता हूँ. अखबार में सामन्य रिपोर्टिंग के अलावा आंकड़ों से भी दुनिया को समझने की की कोशिश की जा रही हैं. एक वेबसाइट है -factly.in इसकी टैग लाइन है – हम सार्वजनिक आंकड़ों को अर्थपूर्ण बनाते हैं (Making Data Meaningful).

ग़ज़ल – न होगा ख़त्म कभी

न होगा ख़त्म कभी प्यार का किस्सा जाना
है क़ायनात का भी इसमें हिस्सा जाना

ख़्वाबों के बने हम रंगो-बू गुलशन से लेते हैं
हमें चिड़ियों सा चहकना, हमें तितली सा मँडराना

सियासत को मज़ा आता है बस टुकड़े ही करने में
कभी मज़हब, कभी साज़िश, कभी यूँ ही जुर्माना

सब बदलता है यहां, कुछ कभी यकसां नहीं रहता
ज़िन्दगी भर लगा रहता है खोना और फिर पाना

उदास रातें चेहरों की चमक छीन लेती हैं
उम्मीद रखना, चुभता सा कोई गीत भी गाना

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सुनने के लिए क्लिक करें –

http://yourlisten.com/Viney.Sharma/VmOTcxYz