ग़ज़ल – न होगा ख़त्म कभी

न होगा ख़त्म कभी प्यार का किस्सा जाना
है क़ायनात का भी इसमें हिस्सा जाना

ख़्वाबों के बने हम रंगो-बू गुलशन से लेते हैं
हमें चिड़ियों सा चहकना, हमें तितली सा मँडराना

सियासत को मज़ा आता है बस टुकड़े ही करने में
कभी मज़हब, कभी साज़िश, कभी यूँ ही जुर्माना

सब बदलता है यहां, कुछ कभी यकसां नहीं रहता
ज़िन्दगी भर लगा रहता है खोना और फिर पाना

उदास रातें चेहरों की चमक छीन लेती हैं
उम्मीद रखना, चुभता सा कोई गीत भी गाना

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