पानी की चादर

हवा जो लेकर बरसात अाई
मुझे भी लौटा अपने साथ लाई

मैं जो उलझा हुअा था फंदो में
खुद को पाता कहां गैर बंदों में
पानी की चादर ने सब धो डाला
मुझे खुद ही में से बाहर निकाला
मन-मयूर नाचा, दिल ने रागिणी गाई

हवा जो लेकर बरसात अाई
मुझे भी लौटा अपने साथ लाई

झूमते जब हैं ये पेड सारे
बना कुछ खूबसूरत मेरे प्यारे
ये हर्षाते हैं, इनका मान रहे
कल्पना की ऊंची उड़ान रहे
हाथ पे हाथ धरे किसने कस्तूरी पाई

हवा जो लेकर बरसात अाई
मुझे भी लौटा अपने साथ लाई

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